वामपंथियों द्वारा भगवान श्रीराम के विषय मे उठाने जाने वाले प्रश्नो
के उत्तर !
के उत्तर !
श्रीराम जी पर लगाए जाने आरोप कितने सही हैं? क्या श्रीराम जी शूद्रविरोधी थे? क्या उन्होने शंबूक का वध किया था ? क्या उन्होने गर्भवती सीता को छोड़ दिया था? क्या उनका या उनके भाइयों का लवकुश से युद्ध हुआ था? क्या सीता जी धरती मे समा गई थी? इस लेख मे इन सब प्रश्नो का उत्तर दिया जाएगा।
आजकल २ पुस्तकें रामायण के नाम से जानी जाती है-
१ वाल्मीकि रामायण
२ तुलसीदास जी की रामचरित मानस।
१ वाल्मीकि रामायण
२ तुलसीदास जी की रामचरित मानस।
इसमे से वाल्मीकि रामायण श्रीराम जी के समय मे लिखी गई है।
आजकल प्राप्त वाल्मीकि रामायण मे ७ काण्ड (Chapter) हैं।
अंतिम काण्ड उत्तर काण्ड है। तपस्वी शंबूक का वध , लवकुश से युद्ध तथा गर्भवती माता सीता जी का त्याग दोनों इसी काण्ड मे आते है।
आजकल प्राप्त वाल्मीकि रामायण मे ७ काण्ड (Chapter) हैं।
अंतिम काण्ड उत्तर काण्ड है। तपस्वी शंबूक का वध , लवकुश से युद्ध तथा गर्भवती माता सीता जी का त्याग दोनों इसी काण्ड मे आते है।
परंतु सच्चाई यह है कि महर्षि वाल्मीकि ने जो रामायण लिखी थी उसमे ६ काण्ड ही थे। सातवा उत्तर काण्ड बाद मे (१७ वी -१८ वी शताब्दी मे ) मिलाया गयाहै। क्योकि उत्तर काण्ड महर्षि वाल्मीकि जी की रचना नहीं है इसलिए श्रीरामजी को तपस्वी शम्बूक का हत्यारा नहीं कहा जा सकता. उन्हें गर्भवती स्त्री माता सीता जी के त्याग का अपराधी भी नहीं कहा जा सकता. अतः सनातन धर्म के आदर्श मर्यादा पुरूषोंत्तम श्रीराम जी को बदनाम करने के लिए किसी दुष्ट नेये उत्तर काण्ड बाद में मिलाया है. इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं।
१- “THE ILIAD OF THE EAST” “दी इलियड ऑफ दी ईस्ट” रामायण का इंगलिश मेसंक्षिप्त अनुवाद है जो FREDERIKA RICHARDSON ने किया था। इसे MACMILLAN AND CO ने १८७० मे प्रकाशित किया था। इसमे केवल
पहले ६ काण्डों का ही विवरणहै। यदि इस अनुवादक के सामने उत्तरकाण्ड होता तो क्या वह उत्तरकाण्ड काअनुवाद न करता।
पहले ६ काण्डों का ही विवरणहै। यदि इस अनुवादक के सामने उत्तरकाण्ड होता तो क्या वह उत्तरकाण्ड काअनुवाद न करता।
२- RALPH T. H. GRIFFITH ने १८७४ में रामायण का इंगलिश मे अनुवाद किया है। इसे लंदन मे TRUBNER AND CO ने तथा भारत मेबनारस मे Lazarus And Co ने छापा था। इसमे भी पहले ६ भागों का अनुवाद है।युद्धकाण्ड के अंत मे अनुवादक उत्तरकांड के विषय मे लिखता हैं –
"The Ramayan ends epically complete, with the triumphant return of Rama and his rescued queen to Ayodhya and his consecration and coronation in the capital of his forefathers. Even if the story were not complete, the conclusion of the last canto of the sixth Book evidently the work of a later hand than Valmiki’s, which speaks of Rama’s glorious and happy reign and promises blessings to those who read and hear the Ramayan, would be sufficient to show that, when these verses were added, the poem was considered to be finished."
अर्थात एक महाकाव्य के रूप मे रामयणविजयी राम की अपनी रानी को बचाने और अपने पूर्वजो की राजधानी मेराज्याभिषेक के साथ पूरी हो जाती है। छठे अध्याय के अंतिम खंड मे वाल्मीकिराम के गौरवशाली और खुशाहाल शासन की बात करते हैं और उनके लिए आशीर्वचनकहते हैं जो रामायण को पढ़ते और सुनते हैं। इससे यह निश्चित हो जाता है किमहाकाव्य यहाँ समाप्त हो जाता है। उत्तरकाण्ड बाद की रचना है जो किसी दूसरेद्वारा लिखी गई है।
"The Ramayan ends epically complete, with the triumphant return of Rama and his rescued queen to Ayodhya and his consecration and coronation in the capital of his forefathers. Even if the story were not complete, the conclusion of the last canto of the sixth Book evidently the work of a later hand than Valmiki’s, which speaks of Rama’s glorious and happy reign and promises blessings to those who read and hear the Ramayan, would be sufficient to show that, when these verses were added, the poem was considered to be finished."
अर्थात एक महाकाव्य के रूप मे रामयणविजयी राम की अपनी रानी को बचाने और अपने पूर्वजो की राजधानी मेराज्याभिषेक के साथ पूरी हो जाती है। छठे अध्याय के अंतिम खंड मे वाल्मीकिराम के गौरवशाली और खुशाहाल शासन की बात करते हैं और उनके लिए आशीर्वचनकहते हैं जो रामायण को पढ़ते और सुनते हैं। इससे यह निश्चित हो जाता है किमहाकाव्य यहाँ समाप्त हो जाता है। उत्तरकाण्ड बाद की रचना है जो किसी दूसरेद्वारा लिखी गई है।
३ – वाल्मीकि रामायण की संस्कृत में ३ टीका मिलती है. उसमे से सबसे मुख्य तथा पुरानी टीका श्री गोविन्दराज जी कीहै. गोविन्दराज जी ने अपना व् अपने गुरु का परिचय बालकाण्ड में रामयण केआरम्भ में तथा युद्ध काण्ड के अंत में दिया है. बीच में कहीं पर ही अपनापरिचय नहीं दिया है. यदि गोविन्दराज जी के सामने उत्तर काण्ड होता तो वहअपना परिचय युद्ध काण्ड ने न देकर उत्तर काण्ड में देते...सन १९०० के आसपासतक जो भी गोविन्दराज की टीका सहित वाल्मीकि रामायण छपी है उनमे उत्तरकाण्डकी टीका नहीं है. परन्तु १९३० के संस्करण में गोविन्दराज की उत्तर काण्डपर टीका मिलती है.उसके उत्तर काण्ड पर जो टीका दी गई है वह पिछले ६ काण्डोंकी टीका से बिलकुल अलग है और उत्तर काण्ड को रामायण का हिस्सा दिखाने केलिए बनाई है.
क्षेत्रीय भाषाओं मे मिलने वाली रामायण और उत्तर काण्ड
भारत में वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर कई प्रादेशिक भाषाओं में रामायणलिखी गई है. जैसे कम्ब रामायण (तमिल में), रंगनाथ तेलुगु (तेलुगु में), तोरवे रामायण (कन्नड़ में) तथा तुलसीदास जी की रामचरित मानस (अवधि में). अबहम क्रम से इन पर विचार करते है.
5- कम्ब रामायण – इसका रचना काल लगभगबारहवी शताब्दी है. संस्कृत से भिन्न उपलब्ध भाषाओ में यह सबसे पुरानीरामायण है. इसके लेखक महाकवि कम्बन है. इसकी मूल भाषा तमिल है. अब तक इसकेहिन्दी में (पहला अनुवाद १९६२ में बिहार राजभाषा परिषद् ) कई अनुवाद हो चुकेहै. इसमें भी बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ ही काण्ड है. यह भी भगवान्श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् श्री राम जी द्वारा दरबार में सभी के लिएप्रशंसा वचन के साथ पूरी होती है. यह बहुत अधिक वाल्मीकि रामायण से मिलतीहै. यदि महाकवि कम्बन जी के सामने वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तोवह इसका वर्णन जरुर करते. परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थीउसमे ६ काण्ड
ही थे.
5- कम्ब रामायण – इसका रचना काल लगभगबारहवी शताब्दी है. संस्कृत से भिन्न उपलब्ध भाषाओ में यह सबसे पुरानीरामायण है. इसके लेखक महाकवि कम्बन है. इसकी मूल भाषा तमिल है. अब तक इसकेहिन्दी में (पहला अनुवाद १९६२ में बिहार राजभाषा परिषद् ) कई अनुवाद हो चुकेहै. इसमें भी बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ ही काण्ड है. यह भी भगवान्श्रीराम जी के राज्य अभिषेक व् श्री राम जी द्वारा दरबार में सभी के लिएप्रशंसा वचन के साथ पूरी होती है. यह बहुत अधिक वाल्मीकि रामायण से मिलतीहै. यदि महाकवि कम्बन जी के सामने वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तोवह इसका वर्णन जरुर करते. परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थीउसमे ६ काण्ड
ही थे.
६- रंगनाथ रामायण – इसका रचना काल लगभग १३८० इस्वी है. इसकी भाषा तेलुगु है परन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद (१९६१ में बिहार राजभाषा परिषद द्वारा) चुका है. यह रामायण श्रीराम जी के राज्यअभिषेक व् दरबार के दृश्य के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकरयुद्ध काण्ड तक ६ काण्ड है. यदि इसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकिरामायण में उत्तर काण्ड होता तो वह अवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनकेसामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थी उसमे ६ काण्ड ही थे.
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७ - तोरवे रामायण – इसका रचना काल लगभग १५०० इस्वी है. इसकी मूल भाषा कन्नड़ हैपरन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद चुका है. इसके लेखक तोरवे नरहरी जी है. यहरामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक, सुग्रीव आदि को विदा करना, रामराज्यमें सुख शान्ति, दरबार के दृश्य तथा रामायण पढने के लाभ के वर्णन के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ६ काण्ड है. यदिइसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वहअवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थीउसमे ६ काण्ड ही थे.
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८-- रामचरित मानस -- गोस्वामी तुलसीदास जीकी राम चरित मानस मे उत्तर काण्ड है। परंतु उसकी विषय वस्तु वाल्मीकि जीके उत्तरकाण्ड से पूरी तरह अलग है। इसमे ना तो शंबूक है, ना लव कुश है, नासीता को वनवास भेजने का विवरण है। अतः तुलसीदास जी के समय भी यह उत्तरकाण्डरामायण का हिस्सा नहीं था। श्रीराम जी के राज्याभिषेक का वर्णन वाल्मीकिजी छठे काण्ड मे करते हैं तो तुलसीदास जी सातवें काण्ड मे।
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७ - तोरवे रामायण – इसका रचना काल लगभग १५०० इस्वी है. इसकी मूल भाषा कन्नड़ हैपरन्तु अब इसका हिंदी में अनुवाद चुका है. इसके लेखक तोरवे नरहरी जी है. यहरामायण श्रीराम जी के राज्य अभिषेक, सुग्रीव आदि को विदा करना, रामराज्यमें सुख शान्ति, दरबार के दृश्य तथा रामायण पढने के लाभ के वर्णन के साथ पूरी हो जाती है . इसमें बालकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ६ काण्ड है. यदिइसके रचियता के सामने उपलब्ध वाल्मीकि रामायण में उत्तर काण्ड होता तो वहअवश्य ही उसका उल्लेख करते परन्तु उनके सामने जो वाल्मीकि रामायण उपलब्ध थीउसमे ६ काण्ड ही थे.
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८-- रामचरित मानस -- गोस्वामी तुलसीदास जीकी राम चरित मानस मे उत्तर काण्ड है। परंतु उसकी विषय वस्तु वाल्मीकि जीके उत्तरकाण्ड से पूरी तरह अलग है। इसमे ना तो शंबूक है, ना लव कुश है, नासीता को वनवास भेजने का विवरण है। अतः तुलसीदास जी के समय भी यह उत्तरकाण्डरामायण का हिस्सा नहीं था। श्रीराम जी के राज्याभिषेक का वर्णन वाल्मीकिजी छठे काण्ड मे करते हैं तो तुलसीदास जी सातवें काण्ड मे।
9- वाल्मीकि रामायण मे फलश्रुति (रामायण पढ़ने के लाभ) युद्ध काण्ड के अन्त मेहै। यदि महर्षि वाल्मीकि जी ने उत्तरकाण्ड लिखा होता तो वह इसे
उत्तर काण्डके अन्त मे देते।
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१०- संस्कृत के सभी ग्रन्थों मे समय समय परमिलावट की जाती रही है। आज रामायण के ४-५ अलग अलग संस्करण मिलते हैं जिसमे एक दूसरे से पूरी तरह अलग श्लोक मिलते हैं। कुल श्लोको की संख्या भी संस्करणों मे अलग अलग है। इससे अनुमान होता है कि स्वार्थी लोग समय पर इनपुस्तकों मे से श्लोक हटाते भी रहे और मिलाते भी रहे। इन मिलावटी श्लोको केकारण ही सनातन धर्म के महापुरुषों का अपमान होता रहा है। उदाहरण के तौर परकम्युनिष्ट लेखिका मृणाल पाण्डे ने एक बार अखबार मे एक लेख लिखा जिसमेमाता सीता द्वारा
( पूजा के तौर पर ) गंगा नदी मे शराब के घड़े डालने काडालने की बात लिखी थी। बाद मे ढूँढने पर पाया कि यह श्लोक केवल एक संस्करणमे है जो किसी शराब पीने वाले ने मिलाया है। इसी तरह केवल एक संस्करण मे सीता द्वारा घूँघट करने का जिक्र मिलता है जो साफ साफ बाद मे मिलाया है।
उत्तर काण्डके अन्त मे देते।
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१०- संस्कृत के सभी ग्रन्थों मे समय समय परमिलावट की जाती रही है। आज रामायण के ४-५ अलग अलग संस्करण मिलते हैं जिसमे एक दूसरे से पूरी तरह अलग श्लोक मिलते हैं। कुल श्लोको की संख्या भी संस्करणों मे अलग अलग है। इससे अनुमान होता है कि स्वार्थी लोग समय पर इनपुस्तकों मे से श्लोक हटाते भी रहे और मिलाते भी रहे। इन मिलावटी श्लोको केकारण ही सनातन धर्म के महापुरुषों का अपमान होता रहा है। उदाहरण के तौर परकम्युनिष्ट लेखिका मृणाल पाण्डे ने एक बार अखबार मे एक लेख लिखा जिसमेमाता सीता द्वारा
( पूजा के तौर पर ) गंगा नदी मे शराब के घड़े डालने काडालने की बात लिखी थी। बाद मे ढूँढने पर पाया कि यह श्लोक केवल एक संस्करणमे है जो किसी शराब पीने वाले ने मिलाया है। इसी तरह केवल एक संस्करण मे सीता द्वारा घूँघट करने का जिक्र मिलता है जो साफ साफ बाद मे मिलाया है।
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